मौत की लपटों के बीच फरिश्ते बनकर उतरे मोहल्ले के युवा, 30-40 लोगों को दी नई जिंदगी डंडे

सशक्त न्यूज नेटवर्क
नई दिल्ली। होटल की खिड़कियों से निकलती आग की लपटें, चारों तरफ फैला काला धुआं और अंदर से आती मदद की चीखें… दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लोरिश स्टे होटल में सोमवार रात का यह मंजर किसी भयावह सपने से कम नहीं था। हर पल मौत करीब आ रही थी, लेकिन इसी बीच कुछ युवाओं ने अपनी जान की परवाह किए बिना आग के दरिया में छलांग लगा दी। किसी ने सीढ़ियां लगाईं, किसी ने बेहोश लोगों को कंधों पर उठाया तो कोई सड़क पर पड़े दम तोड़ते लोगों और पुलिसकर्मियों को सीपीआर देकर उनकी सांसें लौटाने में जुट गया।

21 लोगों की जान लेने वाले इस दर्दनाक हादसे के बीच इन युवाओं ने मानवता की ऐसी मिसाल पेश की, जिसने कई परिवारों के चिराग बुझने से बचा लिए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दमकल विभाग के पहुंचने से पहले ही मोहल्ले के युवाओं ने राहत और बचाव का मोर्चा संभाल लिया था। आसपास की दुकानों और घरों से गद्दे, कंबल और चादरें लाकर होटल के नीचे बिछा दी गईं, ताकि जान बचाने के लिए ऊपर से कूदने वालों को सहारा मिल सके।
हादसे की प्रत्यक्षदर्शी शबीना खान बताती हैं कि उस समय हर तरफ चीख-पुकार थी। लोग जान बचाने के लिए खिड़कियों पर आ गए थे। कोई मदद के लिए पुकार रहा था तो कोई धुएं में बेहोश हो रहा था। ऐसे में असरार खान, वकार, मोहम्मद अफजल, मोहम्मद शोएब खान, वसीम राजा और उनके साथियों ने बिना देर किए होटल के भीतर घुसकर लोगों को बाहर निकालना शुरू कर दिया।

धुएं में थमती सांसों को सीपीआर से लौटाई जिंदगी
आग और धुएं के कारण कई लोगों की सांसें रुकने लगी थीं।
स्थानीय युवक मोहम्मद शोएब खान बताते हैं कि जब लोगों को बाहर निकाला गया तो कई लोग बेहोश थे और सांस नहीं ले पा रहे थे। कुछ की नब्ज बेहद कमजोर हो चुकी थी। ऐसे में युवाओं ने तुरंत सीपीआर देना शुरू किया। जिन लोगों की सांसें थमने लगी थीं, उनमें से कई ने कुछ ही मिनटों बाद फिर से सांस लेना शुरू कर दिया। उस पल ऐसा लगा मानो उन्हें दूसरी जिंदगी मिल गई हो।
मुंह पर कपड़ा बांधा और मौत के बीच पहुंच गए

स्थानीय युवक मोहम्मद अफजल उन लोगों में शामिल थे जो होटल के अंदर तक पहुंचे। वह बताते हैं कि धुआं इतना घना था कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था। आंखों में तेज जलन हो रही थी और सीढ़ियां तपने लगी थीं। इसके बावजूद युवाओं ने मुंह पर कपड़ा बांधा और एक-एक मंजिल पर जाकर लोगों की तलाश शुरू की।
अफजल के अनुसार, कई लोग कमरों के बाहर बेहोश पड़े मिले। कुछ डर के मारे रो रहे थे तो कुछ को समझ ही नहीं आ रहा था कि बाहर कैसे निकलें। युवाओं ने उन्हें कंधों पर उठाया और सुरक्षित बाहर पहुंचाया।

वर्दी और आम आदमी का फर्क मिट गया
राहत अभियान के दौरान कई पुलिसकर्मी भी धुएं और गर्मी की चपेट में आकर बेहोश हो गए। स्थानीय युवा वसीम राजा बताते हैं कि कुछ पुलिसकर्मी अंदर जाकर लोगों को बचा रहे थे। बाहर निकलते ही उनकी हालत बिगड़ गई और वे गिर पड़े। ऐसे में युवाओं ने उन्हें भी सीपीआर देकर संभाला।

वसीम कहते हैं, “उस समय कोई यह नहीं सोच रहा था कि सामने पुलिस वाला है या आम नागरिक। हर सांस की कीमत बराबर थी। जो भी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था, उसे बचाने की कोशिश की जा रही थी।”

चीखों, आंसुओं और साहस की कहानी
मालवीय नगर का यह हादसा जहां 21 परिवारों को जिंदगी भर का दर्द दे गया, वहीं कुछ युवाओं की बहादुरी और इंसानियत की कहानी भी छोड़ गया। जब चारों तरफ मौत का साया था, तब इन युवाओं ने अपने डर को पीछे छोड़कर दूसरों की जिंदगी को प्राथमिकता दी। धुएं से भरी उस रात में ये युवा किसी फरिश्ते की तरह सामने आए और दर्जनों लोगों को मौत के मुंह से खींच लाए। यही वजह है कि हादसे के बाद बचाए गए लोगों और उनके परिजनों की आंखों में इन युवाओं के लिए सिर्फ कृतज्ञता और सम्मान है।

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