सशक्त न्यूज नेटवर्क
ड्यूटी के दौरान लगे आरोपों पर मुकदमा दर्ज कराने से पहले तथ्यों की जांच जरूरी, न्यायिक अधिकारियों को दिए दिशा-निर्देश
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज में उप निरीक्षक समेत 22 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने के विशेष अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया है। न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने कहा कि सरकारी ड्यूटी से जुड़े मामलों में पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का आदेश देने से पहले तथ्यों और वैधानिक प्रक्रियाओं पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है। अदालत ने प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों को इस संबंध में दिशा-निर्देश भी दिए हैं।
मामला महाराजगंज जिले के घुघुली थाना क्षेत्र का है। यहां तैनात उप निरीक्षक राकेश कुमार यादव ने विशेष अदालत के 11 अगस्त के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। विशेष एससी-एसटी अदालत ने उप निरीक्षक, एक कांस्टेबल और 20 अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था।
शिकायतकर्ता पक्ष ने आरोप लगाया था कि छह जून को जमीन और आर्थिक विवाद से जुड़े मामले के बाद रात में पुलिसकर्मी उनके घर में घुसे। इस दौरान परिवार की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने और जातिसूचक टिप्पणियां करने के आरोप लगाए गए थे। शिकायतकर्ताओं के मुताबिक, पुलिस अधीक्षक से शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद उन्होंने विशेष अदालत का दरवाजा खटखटाया।
पुलिस रिपोर्ट पर विचार नहीं करने पर उठाए सवाल
पुलिसकर्मियों की ओर से दलील दी गई कि वे घटना के समय सरकारी दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे। मामले से संबंधित दो परस्पर विरोधी मुकदमे पहले ही दर्ज थे और उनमें आरोपपत्र भी दाखिल हो चुके थे। ऐसे में नई शिकायत को जवाबी कार्रवाई के तौर पर देखा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने पाया कि विशेष अदालत ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश देते समय यह स्पष्ट नहीं किया कि प्रारंभिक जांच की आवश्यकता क्यों नहीं थी। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पुलिस से मंगाई गई रिपोर्ट पर समुचित विचार नहीं किया गया। उपलब्ध अभिलेखों और जनरल डायरी की प्रविष्टियों से पुलिसकर्मियों की मौके पर मौजूदगी और ड्यूटी से जुड़े होने का प्रथम दृष्टया संकेत मिलता था।
बीएनएसएस की धाराओं का पालन जरूरी
हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धाराओं 175(3) और 175(4) के प्रावधानों पर जोर दिया। अदालत के अनुसार, सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित शिकायत पर जांच का आदेश देने से पहले जरूरी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया को मिनी ट्रायल में नहीं बदला जा सकता, लेकिन उपलब्ध तथ्यों और पुलिस के पक्ष की अनदेखी भी नहीं की जा सकती।
अदालत ने प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से पहले पुलिस का पक्ष, उपलब्ध रिपोर्ट और कानूनी प्रावधानों पर विचार करें। जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को मासिक बैठकों में इन निर्देशों के अनुपालन की निगरानी करने को भी कहा गया है। फैसले की प्रति संबंधित न्यायिक अधिकारियों और वरिष्ठ प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों को भेजने का निर्देश दिया गया है।

