होली पर नहीं खुशी नहीं, शोक मनाते हैं यहां के लोग

ऐतिहासिक घटनाओं के कारण , सबसे जुदा है डलमऊ की होली
रायबरेली : जब चारों ओर लोग होली के उल्लास में सराबोर रहते हैं तो डलमऊ के दो दर्जन से अधिक गांव के लोग सदियों पूर्व अपने राजा की मौत पर आज भी कहीं तीन दिन तो कहीं एक सप्ताह का मातम मनाते हैं, होली पर शोक मनाने की यह परम्परा डलमऊ की पहचान बन चुकी है।

संगीत, रंग व उमंग आदि होली के प्रमुख अंग हैं । होली के अवसर पर प्रकृति भी रंग-बिरंगे इठलाते यौवन के साथ अपनी पूर्ण अवस्था पर होती है। बच्चे हों या बूढ़े सभी एक दूसरे की कटुता को भूलकर आपसी सौहार्द के रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ रंगों की फुहार सी फूट पड़ती है। महिलाएं भी होली गीतों में थिरकती व एक दूजे को रंग लगाकर रिस्तों के रंग को और गहरा करती हैं।

तीन दिन गम फिर मनाते हैं होली
डलमऊ में होली के पर्व पर लोग गम में डूबे रहते हैं, लगभग 1321ई० पूर्व डलमऊ के राजा डलदेव नए संवत्सर के आगमन का जश्न मना रहे थे । तभी जौनपुर के शाहशर्की की सेना ने डलमऊ के किले पर आक्रमण बोल दिया । राजा डलदेव को आक्रमण की खबर मिलते ही वह अपने सैनिकों को दुश्मन की सेना को मुहतोड़ जवाब देने का आदेश देते हुए स्वयं युद्ध करने के लिए दो सौ सिपाहियों के साथ मैदान में कूद पड़े ।

युद्ध करते समय जौनपुर के शाहशर्की की सेना ने पखरौली गांव के निकट राजा डलदेव को मार दिया । इस युद्ध में राजा डलदेव के दो सौ व शाहशर्की के दो हजार सैनिक मारे गए थे ।सदियां गुजर गई इसके बावजूद डलमऊ तहसील के 28 गांवों में तीन दिनो का शोक मनाया जाता है । होली का त्यौहार आते ही आज भी उक्त ऐतिहासिक घटना की याद ताजा हो जाती है । जिसके कारण लोग होली के आनन्द के स्थान पर शोक में डूबे रहते हैं ।

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