सशक्त न्यूज नेटवर्क
वाराणसी। पितृपक्ष में काशी के पिशाचमोचन तीर्थ पर इन दिनों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। यहां अकाल मृत्यु और पितरों की शांति के लिए अलग-अलग विधानों से श्राद्ध और तर्पण कराया जा रहा है। मान्यता के अनुसार नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध और तर्पण के बाद घोड़े का कान छूना और पीपल के पेड़ पर मृतक की तस्वीर लगाना प्रक्रिया का अहम हिस्सा माना जाता है।
आदि गंगा विमलोदत्त कुंड के किनारे इन दिनों रोजाना हजारों लोग श्राद्ध कर्म के लिए पहुंच रहे हैं। यहां करीब 10 से 12 तरह के श्राद्ध कर्म कराए जाते हैं। अकाल मृत्यु वाले लोगों के लिए विशेष रूप से नारायण बलि और त्रिपिंडी श्राद्ध कराया जाता है।
पीपल पर तस्वीर लगाकर की जाती है अंतिम रस्म
अकाल मृत्यु से मुक्ति की कामना के लिए मृतक की तस्वीर पीपल के पेड़ पर लगाई जाती है। इसके साथ घोड़े का कान, गाय की पूंछ और भैंस का सींग छूकर दान करने की परंपरा भी है। मान्यता है कि इससे अकाल मृत्यु के बाद भटक रही आत्मा को शांति मिलती है।
पिशाचमोचन में पितृपक्ष के दौरान संजाब नस्ल के दो घोड़े भी खड़े किए गए हैं। इनमें एक घोड़े का नाम शक्ति है। बताया जाता है कि इन घोड़ों का उपयोग मुख्य रूप से श्राद्ध के 15 दिनों में होता है। एक व्यक्ति घोड़े का कान छूने के लिए कम से कम 10 रुपये दान करता है।
एक मृतक के श्राद्ध पर 15 से 30 हजार तक खर्च
यहां श्राद्ध कराने की अलग-अलग विधियों के लिए अलग शुल्क निर्धारित है। नारायण बलि में पांच ब्राह्मणों से अनुष्ठान कराने का खर्च करीब 15 हजार रुपये बताया गया है। त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए करीब आठ हजार और पार्वण श्राद्ध के लिए करीब 2500 रुपये खर्च होते हैं। एक मृतक के तर्पण में कई बार 15 से 20 हजार रुपये, जबकि विशेष परिस्थितियों में 30 हजार रुपये तक खर्च हो जाते हैं।
डेढ़ से दो घंटे में पूरा होता है तर्पण
पिशाचमोचन में तर्पण की प्रक्रिया में करीब डेढ़ से दो घंटे लगते हैं। पितृपक्ष के 15 दिनों में यहां बड़ी संख्या में पंडित श्राद्ध कर्म कराते हैं। तर्पण के लिए स्थान का किराया भी लिया जाता है। सुबह सूर्योदय से शुरू होने वाला यह सिलसिला देर रात तक चलता है।
स्थानीय लोगों और पंडितों के अनुसार पिशाचमोचन में आने वाले श्रद्धालुओं में बड़ी संख्या उन परिवारों की होती है, जिनके किसी सदस्य की असमय या अकाल मृत्यु हुई है। धार्मिक मान्यता है कि यहां श्राद्ध और तर्पण कराने से पितरों को शांति मिलती है और प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है।

