सशक्त न्यूज नेटवर्क
लखनऊ: यूपी के सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में चर्चाओं का दौर जारी है। अंदरखाने की बातें कभी बैठकों तक सीमित रहती हैं तो कभी कानाफूसी के रास्ते बाहर आ जाती हैं। इन दिनों तीन किस्से चर्चा में हैं। पहला एक ऐसे नौकरशाह से जुड़ा है, जिनके व्यवहार को लेकर मातहत अफसरों में नाराजगी की चर्चा है। दूसरा एक नेता की ‘उत्तराधिकारी’ बनने की कथित महत्वाकांक्षा से जुड़ा है। तीसरी चर्चा हाल में मंत्री बने एक माननीय के भाषण से जुड़ी है।
बैठक में अफसरों की फजीहत, कामकाज पर भी असर की चर्चा
सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि कुछ अफसर बैठकों में अपने मातहतों के साथ बेहद सख्त और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि बैठकों में विभागीय अफसरों को सार्वजनिक तौर पर खरी-खोटी सुनाई जाती है। ऑनलाइन बैठकों में कई बार संबंधित अधिकारियों के मातहत भी मौजूद रहते हैं।
बताया जाता है कि इसका असर सिर्फ अफसरों की नाराजगी तक सीमित नहीं रहता। बैठक में फटकार खाने वाले अधिकारी बाद में अपने ही मातहतों से प्रभावी तरीके से काम लेने में असहज महसूस करते हैं। इससे विभागीय कामकाज प्रभावित होने की चर्चा है। हालांकि, इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
सोशल मीडिया पर ‘उत्तराधिकारी’ बनाने की मुहिम
दूसरी चर्चा एक प्रभावशाली नेता को लेकर है। सियासी हलकों में चर्चा है कि उनके समर्थक उन्हें भविष्य के नेतृत्व के चेहरे के तौर पर पेश करने में जुटे हैं। सोशल मीडिया पर भी उनके समर्थन में तरह-तरह के ट्रेंड चलाए जाने की बात सामने आ रही है।
सियासी जानकारों के बीच इसको लेकर अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं। फिलहाल यह चर्चा समर्थकों की सोशल मीडिया गतिविधियों तक ही दिखाई दे रही है। नेता की ओर से ऐसी किसी दावेदारी की आधिकारिक घोषणा का उल्लेख नहीं है।
मंत्री बने माननीय के सामने नई चुनौती, भाषण पढ़ने में हो रही दिक्कत?
तीसरी चर्चा हाल में मंत्री बने एक माननीय से जुड़ी है। बताया जा रहा है कि पहले संगठन की जिम्मेदारी संभालने के दौरान उन्हें तैयार लिखित भाषण पढ़ने की जरूरत कम पड़ती थी। अब मंत्री बनने के बाद विभागीय कार्यक्रमों में उन्हें लिखित भाषण पढ़कर संबोधित करना पड़ रहा है।
चर्चा है कि हिंदी में लिखे भाषण को पढ़ते समय उन्हें सहज प्रवाह बनाए रखने में दिक्कत होती है। इसी को लेकर सियासी गलियारों में तंज भी सुनने को मिल रहा है कि माननीय को सार्वजनिक भाषण की थोड़ी ‘कोचिंग’ की जरूरत है।
यूपी की राजनीति में ऐसे किस्से अक्सर चर्चा का हिस्सा बनते हैं। इनमें किए गए दावों और अंदरखाने की चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर जरूरी है।

