नई दिल्ली: अभी मौसम ने पूरी तरह करवट भी नहीं बदली है, लेकिन आगे की तस्वीर को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ गई है। भारत पर मजबूत अल-नीनो का खतरा मंडरा रहा है। 180 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने संभावित गंभीर पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर समय रहते तैयारी करने की अपील की है। आशंका है कि इसका असर बारिश, तापमान और खेती से लेकर जंगलों और समुद्री पारिस्थितिकी तक दिखाई दे सकता है।
कई महीनों तक रह सकता है असर
मौजूदा आकलनों के मुताबिक अल-नीनो की स्थिति 2026 के मध्य से बनी हुई है और इसके 2027 की शुरुआत तक जारी रहने की संभावना है। अक्टूबर से दिसंबर के बीच इसकी तीव्रता बढ़ सकती है। ऐसे में आने वाले महीनों में मौसम के मिजाज पर लगातार नजर रखने की जरूरत होगी।
सबसे बड़ा सवाल- क्या कमजोर होगा मानसून?
भारत के लिए अल-नीनो की सबसे बड़ी चिंता मानसून को लेकर होती है। मजबूत अल-नीनो के दौरान मानसूनी गतिविधियां प्रभावित होने और बारिश सामान्य से कम रहने का जोखिम बढ़ सकता है। इसका सीधा असर खेती और पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है। हालांकि, मानसून सिर्फ अल-नीनो से तय नहीं होता। समुद्री और वायुमंडलीय कई अन्य परिस्थितियां भी बारिश को प्रभावित करती हैं।
गर्मी और सूखे का बढ़ सकता है दबाव
अगर अल-नीनो मजबूत होता है तो तापमान बढ़ने और सूखे की स्थिति बनने का खतरा बढ़ सकता है। इसका असर फसलों के साथ जलाशयों और भूजल पर भी पड़ सकता है। खासतौर पर बारिश पर निर्भर खेती वाले इलाकों में किसानों के सामने सिंचाई और उत्पादन से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
जंगलों में आग का खतरा भी
वैज्ञानिकों की चिंता सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है। ज्यादा गर्मी और कम नमी के कारण जंगलों में आग का खतरा बढ़ सकता है। इससे पेड़-पौधों, वन्यजीवों और जंगलों पर निर्भर स्थानीय समुदायों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
समुद्र भी दे सकता है ‘झटका’
समुद्र का तापमान बढ़ने का असर समुद्री जीवन पर भी पड़ सकता है। गर्म पानी के कारण प्रवाल भित्तियों में कोरल ब्लीचिंग बढ़ सकती है। इससे समुद्री जैव विविधता प्रभावित होने के साथ मछली पालन और समुद्र पर निर्भर समुदायों के सामने भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
क्या है ‘सुपर अल-नीनो’?
अल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ने की स्थिति है। इसका असर दुनिया के मौसम पर पड़ता है। ‘सुपर अल-नीनो’ शब्द आमतौर पर बेहद मजबूत अल-नीनो के लिए इस्तेमाल किया जाता है, हालांकि यह अल-नीनो की कोई अलग आधिकारिक वैज्ञानिक श्रेणी नहीं है।
अभी से तैयारी पर जोर
वैज्ञानिकों का कहना है कि संभावित असर को देखते हुए सरकार और संबंधित एजेंसियों को पहले से तैयारी करनी चाहिए। मौसम की निगरानी, जल प्रबंधन, कृषि सलाह, जंगलों में आग की रोकथाम और समुद्री पारिस्थितिकी की निगरानी को मजबूत करना अहम होगा।
यानी खतरा सिर्फ आसमान से बरसने वाली बारिश का नहीं है। अगर अल-नीनो ने जोर पकड़ा तो खेत से लेकर जंगल और समुद्र तक, मौसम की यह करवट कई मोर्चों पर असर दिखा सकती है।

