सशक्त न्यूज नेटवर्क
नई दिल्ली। पितृ पक्ष को पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य किया जाता है। साथ ही कुछ नियमों का पालन करने की भी परंपरा है। इस बार पितृ पक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्तूबर तक चलेगा।
बाल और नाखून काटने से बचें
पितृ पक्ष के दौरान बाल और नाखून काटने से बचने की परंपरा है। मान्यता है कि इन दिनों व्यक्ति को सांसारिक साज-सज्जा से अधिक पितरों के स्मरण और धार्मिक कर्मों पर ध्यान देना चाहिए।
तर्पण और दान का विशेष महत्व
पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने की परंपरा है। सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, अन्न, वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान भी किया जाता है। माना जाता है कि श्रद्धा से किया गया दान पुण्यकारी होता है।
मांगलिक कार्यों से बनाएं दूरी
पितृ पक्ष को आमतौर पर मांगलिक कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। इसलिए इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्यों को करने से बचने की परंपरा है। यह समय मुख्य रूप से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पित माना जाता है।
भोजन में सात्विकता रखें
इन दिनों सात्विक और सादा भोजन करने की परंपरा है। कई परिवार मांसाहार, शराब और अत्यधिक तामसिक भोजन से परहेज करते हैं। घर में बनने वाले भोजन में भी साफ-सफाई और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
पंचग्रास निकालने की परंपरा
श्राद्ध के भोजन में पंचग्रास की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। भोजन का एक हिस्सा गाय, कुत्ते, कौवे, देवताओं और चींटियों के लिए निकालने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसे पितरों के प्रति श्रद्धा और सभी जीवों के प्रति करुणा का प्रतीक माना जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या पर विशेष श्राद्ध
पितृ पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ होता है। जिन पूर्वजों की श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है। इसे पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष अवसर माना जाता है।
ध्यान रखें: पितृ पक्ष से जुड़े नियम और परंपराएं परिवार, क्षेत्र और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।

