सशक्त न्यूज नेटवर्क
डलमऊ। तिथि ज्ञात हो तो उसी दिन श्राद्ध का विधान, अकाल मृत्यु वालों के लिए चतुर्दशी और मातृ नवमी का भी विशेष महत्व
पितृपक्ष में पितरों के प्रति श्रद्धा और तर्पण का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिस तिथि को किसी व्यक्ति का देहावसान हुआ हो, पितृपक्ष में उसी तिथि को उसका श्राद्ध किया जाता है। हालांकि, यदि किसी परिजन की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो या किसी कारण से श्राद्ध की निर्धारित तिथि छूट गई हो तो इसके लिए भी शास्त्रों में विशेष तिथियां बताई गई हैं।
अमावस्या को कर सकते हैं सर्वपितृ श्राद्ध
मृत्यु की तिथि ज्ञात न होने पर सर्वपितृमोक्ष अमावस्या को श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है। मान्यता है कि इस दिन उन पितरों का भी श्राद्ध किया जाता है, जिनकी निर्धारित तिथि याद नहीं है या किसी कारण से श्राद्ध कर्म छूट गया है। जिनका विधिवत अंत्येष्टि संस्कार नहीं हो पाया हो, उनके निमित्त भी इस दिन श्राद्ध करने का विधान बताया गया है।
किसके लिए कौन सी तिथि
धार्मिक परंपराओं में पितृपक्ष की अलग-अलग तिथियों का विशेष महत्व बताया गया है। प्रतिपदा को नाना-नानी अथवा ऐसे मातृकुल के पूर्वजों का श्राद्ध किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो। पंचमी अविवाहित अवस्था में दिवंगत परिजनों के श्राद्ध के लिए मानी गई है।
नवमी को मातृ नवमी कहा जाता है। इस दिन माता और दिवंगत सौभाग्यवती महिलाओं के निमित्त श्राद्ध किया जाता है। एकादशी और द्वादशी संन्यास ग्रहण कर चुके पूर्वजों के लिए मानी गई हैं। बाल्यावस्था में दिवंगत बच्चों के लिए कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी का विधान बताया गया है।
अकाल मृत्यु, दुर्घटना, अस्त्र-शस्त्र, विषपान या आत्महत्या से हुई मृत्यु के मामलों में चतुर्दशी को श्राद्ध करने की परंपरा है। वहीं, यदि किसी पितर की मृत्यु तिथि ज्ञात है तो सामान्य नियम के अनुसार उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।
दोपहर में श्राद्ध, तर्पण के बाद पंचबलि
श्राद्ध कर्म के दौरान स्नान कर पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण किया जाता है। सामर्थ्य के अनुसार सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराने और दक्षिणा देने की परंपरा भी बताई गई है। कौवे, गाय और चींटियों समेत पंचबलि के निमित्त अन्न निकालने का भी विधान है।
श्राद्ध के समय पितृ गायत्री के रूप में प्रचलित मंत्र का तीन बार पाठ करने की परंपरा है—
“देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत।।”
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध कर्म मध्याह्न काल में करना चाहिए। सुबह और शाम श्राद्ध न करने की परंपरा बताई गई है।
सूतक-पातक के भी अलग-अलग नियम
धर्मशास्त्रीय परंपराओं में जन्म और मृत्यु के बाद लगने वाले अशौच यानी सूतक-पातक की अवधि भी अलग-अलग परिस्थितियों में अलग बताई गई है। सामान्य रूप से 10 दिन का अशौच माना गया है। बालक की मृत्यु दांत निकलने से पहले होने पर स्नान मात्र से अशौच समाप्त होने की बात कही गई है। दांत निकलने के बाद मुंडन संस्कार तक एक दिन, मुंडन के बाद उपनयन से पहले तीन रात्रि और उपनयन के बाद 10 दिन का अशौच बताया गया है।
परंपरागत धर्मशास्त्रीय मतों में वर्ण के आधार पर भी अशौच की अलग अवधि का उल्लेख मिलता है। संन्यासी के देहावसान पर अशौच नहीं मानने की परंपरा बताई गई है। गर्भस्राव की स्थिति में गर्भ के जितने महीने हुए हों, उतनी रात्रियों के अशौच का विधान भी बताया गया है।
पितृपक्ष का उद्देश्य केवल कर्मकांड तक सीमित न होकर दिवंगत परिजनों के प्रति श्रद्धा और स्मरण से जुड़ा माना जाता है। इसलिए मृत्यु तिथि ज्ञात होने पर उसी तिथि और तिथि ज्ञात न होने पर परंपरा में निर्धारित तिथि पर श्रद्धापूर्वक तर्पण और श्राद्ध करने की मान्यता है।

