सशक्त न्यूज नेटवर्क
नई दिल्ली
कहने को यह देश की राजधानी दिल्ली है, जहां से चंद किलोमीटर की दूरी पर देश के हुक्मरान बैठते हैं और बड़ी-बड़ी योजनाओं के दावे किए जाते हैं। लेकिन संसद भवन से महज 20 किलोमीटर और दिल्ली विधानसभा से करीब 10 किलोमीटर दूर बसा बदरपुर खादर गांव आज भी 21वीं सदी की मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले इस गांव की करीब 4,000 आबादी आज भी पीने के पानी, बिजली, स्वास्थ्य और सार्वजनिक परिवहन जैसी बेसिक सुविधाओं के लिए तरस रही है।
पाइपलाइन बिछी, पर बूंद-बूंद को तरस रहे लोग
गांव में पीने के पानी के लिए जल बोर्ड की पाइपलाइन तो बिछा दी गई है, लेकिन ग्रामीणों का दर्द है कि आज तक नलों में पानी की एक बूंद नहीं टपकी। मजबूरी में पूरे गांव को पानी के टैंकरों के भरोसे रहना पड़ता है। गर्मियों के दिनों में तो स्थिति बेहद भयावह हो जाती है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब आधारभूत ढांचा तैयार है, तो प्रशासन जलापूर्ति शुरू करने में हीलाहवाली क्यों कर रहा है?
बिजली के लिए दूसरों पर निर्भरता, देने पड़ रहे एक्स्ट्रा पैसे
गांव में बिजली की स्थिति भी बेहद खराब है। महज कुछ ही घरों में आधिकारिक बिजली मीटर लगे हैं, जबकि बहुसंख्यक आबादी को पड़ोसियों के घरों से केबल खींचकर काम चलाना पड़ रहा है। इसके बदले उन्हें भारी-भरकम कीमत भी चुकानी पड़ती है। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और रोजमर्रा के कामकाज पर पड़ रहा है। स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि हर घर को लीगल बिजली कनेक्शन दिया जाए ताकि वे दूसरों पर निर्भर न रहें।
न अस्पताल, न बस सुविधा
स्वास्थ्य सेवाएं ठप: 4 हजार की आबादी वाले इस गांव में न तो कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) है और न ही कोई डिस्पेंसरी। रात-बिरात किसी की तबीयत बिगड़ने पर मरीज को अस्पताल पहुंचाना किसी जंग से कम नहीं होता।
लास्ट माइल कनेक्टिविटी न के बराबर: सार्वजनिक परिवहन का हाल यह है कि गांव तक न तो डीटीसी बसें आती हैं और न ही ई-रिक्शा या ऑटो का कोई तय रूट है। मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को करीब 5 किलोमीटर पैदल या निजी साधनों से जाना पड़ता है।
ग्रामीणों का दर्द:
”पानी की पाइपलाइन तो डाल दी गई, पर नल सूखा ही रहता है। टैंकर आते हैं तो धक्का-मुक्की करनी पड़ती है। आखिर कब तक ऐसा चलेगा?”
— शरीक, स्थानीय निवासी
”कुछ ही घरों में मीटर हैं। हमें दूसरों से बिजली लेनी पड़ती है और इसके लिए मनमाना किराया देना पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई ठप हो जाती है।”
— शब्बो, स्थानीय निवासी
”दिल्ली का हिस्सा होते हुए भी हम किसी दूर-दराज के पिछड़े गांव जैसी जिंदगी जी रहे हैं। रात में कोई बीमार पड़ जाए तो जान पर बन आती है।”
— राकेश कुमार, स्थानीय निवासी

