सशक्त न्यूज नेटवर्क
दशाश्वमेध घाट पर चार से पांच और मार्कंडेय महादेव घाट पर मिले दो से तीन कण, बीएचयू के पर्यावरणविद् की रिपोर्ट से बढ़ी चिंता
वाराणसी। मोक्षदायिनी गंगा के पानी में अब माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का खतरा भी तेजी से सामने आ रहा है। काशी में गंगा के अलग-अलग घाटों से लिए गए पानी के नमूनों की जांच में एक लीटर पानी में औसतन 1.5 से 2.5 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए हैं। वहीं, सरायमोहाना घाट पर प्रदूषण की स्थिति सबसे चिंताजनक मिली है। यहां एक लीटर पानी में माइक्रोप्लास्टिक के सात कण मिले हैं। दशाश्वमेध घाट पर चार से पांच और मार्कंडेय महादेव घाट पर दो से तीन कण प्रति लीटर पाए गए हैं। गंगा के पानी में प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों की मौजूदगी ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है।
बीएचयू के पर्यावरणविद् डॉ. कृपा राम की ओर से तैयार रिपोर्ट में गंगा के अलग-अलग घाटों पर माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी का खुलासा हुआ है। जांच में गड़वाघाट पर एक से 1.8 कण प्रति लीटर मिले, जबकि शूलटंकेश्वर महादेव घाट पर इनकी संख्या सबसे कम 0.5 से एक कण प्रति लीटर दर्ज की गई। आंकड़े बताते हैं कि गंगा के अलग-अलग हिस्सों में प्रदूषण का स्तर एक जैसा नहीं है।
माइक्रोप्लास्टिक पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक के कणों को कहा जाता है। ये कण प्लास्टिक की बोतलों, पैकेजिंग सामग्री, कपड़ों के रेशों और अन्य प्लास्टिक उत्पादों के टूटने से पैदा होते हैं। आकार बेहद छोटा होने के कारण इन्हें सामान्य तरीके से पानी से अलग करना मुश्किल होता है। यही वजह है कि इनकी मौजूदगी जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए चुनौती बनती जा रही है।
माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी के लिए केंद्र सरकार ने पिछले महीने पांच मिलीमीटर तक के प्लास्टिक कणों की पहचान और निगरानी को लेकर नया प्रोटोकॉल जारी किया था। इसके तहत बृहस्पतिवार को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के कार्यालय में निगरानी टीम की पहली बैठक हुई। बैठक हाइब्रिड मोड में आयोजित की गई। इसमें गंगा में माइक्रोप्लास्टिक के स्रोत, उनकी मात्रा और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करने पर चर्चा हुई।
इस पहल में बीएचयू और आईआईटी रुड़की समेत आठ संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल हैं। अभियान के तहत गंगा में प्रदूषण के हॉटस्पॉट, माइक्रोप्लास्टिक के बहाव के रास्तों और इसके संभावित प्रभावों की पहचान की जाएगी। साथ ही नियमित निगरानी की व्यवस्था विकसित करने की योजना है, ताकि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम उठाए जा सकें।

